तिश्नगी

तिश्नगी प्रीत है, रीत है, गीत है
तिश्नगी प्यास है, हार है, जीत है

Sunday, 23 June 2013

हमें लौटना होगा पहाड़ !

जब बरसातें थम चुकी होंगी
जब तीर्थयात्री और पर्यटक
लौट चुके होंगे वापस
अपने-अपने आशियानों में
और जब माँ गँगा का क्रोध
शान्त हो चुका होगा,
हमें लौटना होगा पहाड़ ।

फिर से तलाशनी होगी प्राणवायु
हटाना होगा मिट्टी-पत्थर से बना मलबा
खोजनी होगी अपनी बची-खुची जमीन
फिर से बनाने होंगे उजड़े हुए मकान
टूटे हुए पुश्ते, टूटी दीवारें,
पुल और सड़कें ।

फिर से रखना होगा नींव का पत्थर
फिर से शुरू करना होगा कोई रोजगार
फिर से देखने होंगे सपने,
बहते आँसुओं को पोंछते हुए ।

फिर से बनायेंगे एक गौशाला
और पालेंगे मवेशियों को भी ।

हाँसमय लगेगा
घाव उथले तो हैं नहीं
पूरा समय लेंगे भरने में
मगर जब दर्द कुछ कम होगा
तो खेतों में लहलहा रहा होगा धान
मक्का कोदा झँगोरा और सरसों,
पेड़ों पर फिर से लद चुके होंगे फल
सेब, आडू और खुबानी के ।

गँगाजल फिर से मीठा हो चुका होगा
बद्री-केदार में आरतियाँ प्रारम्भ हो चुकी होंगी ।

बच्चे फिर से बस्ता सजा रहे होंगे
फिर से लौट आएगा -
गाय का रम्भाना
कोयल की कूक और
बच्चों की किलकारियाँ ।

पोंछ डालो अब इन आँसुओं को
विधाता की इच्छा के आगे किसी का बस नहीं चलता,
चलो बनायें एक नया गढ़वाल-कुमाऊँ
चलो लौट चलें पहाड़ों की ओर ।
     
                 शीष नैथानी लिल
                 २३ जून, २०१३

10 comments:

  1. आपकी यह रचना कल मंगलवार (25 -06-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  2. शुक्रिया भाई अरुण जी!

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  3. बहुत बढ़िया लिखा है.

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    1. शुक्रिया आदरणीय निहार जी !

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  4. फिर से रखना होगा नींव का पत्थर । बहुत प्रेरक रचना ।

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  5. उत्क्रुस्त , भावपूर्ण एवं सार्थक अभिव्यक्ति .
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें .

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