तिश्नगी

तिश्नगी प्रीत है, रीत है, गीत है
तिश्नगी प्यास है, हार है, जीत है

Wednesday, 3 May 2017

नई दुनिया, इंदौर में प्रकाशित कविता - ३०/अप्रैल/२०१७ !!


Tuesday, 30 August 2016

दो शेर !!

रिश्ते बिगाड़ते हो भला क्यों सँवारकर
क्या पाइयेगा आप यहाँ जीत-हारकर

हमको रिहाइयों के समन्दर से दूर रख
कागज़ की कश्तियाँ है ज़रा देख-भालकर ||

आशीष नैथानी !!

Rishte Bigaadte Ho Bhala Kyon Sawarkar
Kya Paaiyega Aap Yahan Jeet-Haarkar

Hamko Rihaaiyon Ke Samandar Se Door Rakh
Kaagaz Ki Kashtiyaan Hain Zara Dekh-bhaalkar

Ashish Naithani !!
(Mumbai)


Saturday, 27 August 2016

Ek sher !!

हर ज़र्रा आईने में
ख़ुद को सूरज लगता है

- आशीष नैथानी !!

Friday, 29 July 2016

एक समन्दर तन्हा-तन्हा

एक समन्दर तन्हा-तन्हा
बाहर-भीतर तन्हा-तन्हा

आगन्तुक का शोर-शराबा
फिर भी दिनभर तन्हा-तन्हा

नीचे लहरों की ख़ामोशी
ऊपर अम्बर तन्हा-तन्हा

साहिल की धरती का मंज़र
पत्थर-पत्थर तन्हा-तन्हा

ख़्वाब सफ़ीना डूब गया तो
रोया सागर तन्हा-तन्हा

तू भी तन्हा यार समन्दर
मेरा भी घर तन्हा-तन्हा ||

- आशीष नैथानी !!

Thursday, 16 June 2016

तीन बरस त्रासदी के

घाव अब धीरे-धीरे भरने लगे हैं.
एक सुकूं भरे कल की उम्मीद आँखों में है. जहाँ ज़मीन से मिट्टी बह चुकी थी वहाँ पुनः हरियाली खिल रही होगी. इस बसंत फ्योंली के फूल भी खिले होंगे. बर्फ़ पर धूप उसी सुन्दरता से चमक रही होगी. जीवन पुनः चलने लगा होगा.

उस त्रासद को याद करते हुए -

पहाड़ों पर सुनामी थी या था तूफ़ान पानी में
बहे बाज़ार घर-खलिहान और इन्सान पानी में

बड़ा वीभत्स था मंज़र जो देखा रूप गंगा का
किसी तिनके की माफ़िक बह रहा सामान पानी में

बहुत नाजुक है इन्सानी बदन इसका भरोसा क्या
भरोसा किसपे हो जब डूबते भगवान पानी में

इधर कुछ तैरती लाशें उधर कुछ टूटते सपने
न जाने लौटकर आएगी कैसे जान पानी में

बहुत मुश्किल है अपनी आँख के पानी को समझाना
अचानक दफ्न कैसे होती है मुस्कान पानी में

आशीष नैथानी !!

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