तिश्नगी

तिश्नगी प्रीत है, रीत है, गीत है
तिश्नगी प्यास है, हार है, जीत है

Sunday, 27 July 2014

माँ और पहाड़ !!

सीढ़ियों पर चढ़ता हूँ
तो सोचता हूँ माँ के बारे
कैसे चढ़ती रही होगी पहाड़ |

जेठ के उन तपते घामों में
जब मैं या दीदी या फिर छोटू बीमार पड़े होंगे
तो कैसे हमें उठाकर लाती रही होगी
हमारा लाश सा बेसुध तन
डॉक्टर के पास |

घास और लकड़ी के बड़े-बड़े गठ्ठर
चप्पल जितनी चौड़ी पगडंडियों पर लाना
कोई लतीफ़ा तो  रहा होगा
वो भी तब जब कोई ऊँचाई से खौफ़ खाता हो |

जंगलों की लाल तपती धूप
नई और कमजोर माँ पर रहम भी  करती रही होगी
माँ के साँवलेपन में ईष्टदेव सूरज
करीने से काजल मढ़ते होंगे
और माँ उन्हें सुबह-सुबह ठंडा जल पिलाती होगी | 

पूर्णिमा पर चाँद की पूजा करने वाली
अँधेरे में डरते-डरते छत पर जाती होगी
और भागती होगी पूजा जल्दी से निपटाकर
डर से जैसे सन्नाटा पीछा कर रहा हो,
खुद को सँभालती हुई तंग छज्जे पर |

हममें से कोई रो पड़ता
और उसकी नींद स्वाह हो जाती |

हमें सुलाने के लिए कभी-कभी
रेडियो चलाती
धीमी आवाज में गढ़वाली गीत सुनती,
गुनगुनाती भी |

उन पहाड़ों की परतों के पार
शायद ही दुवाएँप्रार्थनाएँ जाती रही होंगी
जाती थी सिर्फ एक रोड़वेज़ की बस
सुबह-सुबह
जो कभी अपनों को लेकर नहीं लौटती थी |

पिताजी एक गरीब मुलाजिम रहे,
आप शायद दोनों का अर्थ बखूबी जानते होंगे
गरीब का भी और मुलाजिम का भी |

छब्बीस की उम्र में
चार कदम चलकर थकने लगता हूँ मैं
साँस किसी बच्चे की तरह
फेफड़ों में धमाचौकड़ी करने लगती है,
बात-बात पर मैं अक्सर बिखर सा जाता हूँ |

क्या इसी उम्र में माँ भी कभी निराश हुई होगी
अपने तीन दुधमुँहे बच्चों से,
पति का पत्र  मिलने की चिन्ता भी बराबर रही होगी  |

थकताटूटता हूँ तो करता हूँ माँ से बातें
(फोन पर ही सही)
निराशा धूप निकलते ही
कपड़ों के गीलेपन के जैसे गायब हो जाती है
सोचता हूँ
वो किससे बातें किया करती होगी तब
दुःख दर्द में
अवसाद की घड़ियों में,
ससुराल की तकलीफ़ किसे कहती होगी
वो जिसकी माँ उसे  साल में ही छोड़कर चल बसी थी |

शीष नैथानी  
मार्च/२३/२०१४
हैदराबाद !!

ग़ज़ल !!

मुंसिफ़ों ने नहीं पूछी मेरी इच्छा मुझसे
जाने किस बात से नाराज़ है दुनिया मुझसे |

नौकरी छूटी तो फिर देर से घर आने लगा
डर था माँगे खिलौना मेरा बच्चा मुझसे |

रंग गिरना है हवेली का भी अबके सावन
गुफ़्तगू में कहे आषाढ़ महीना मुझसे |

हिज़्र की रात मेरे साथ ग़ज़ब और हुआ
रौशनी माँग रहा था जो अँधेरा मुझसे |

खर्च कर दे मुझे तू अपने लिए चैन कमा
कह गया जेब का वो आख़िरी सिक्का मुझसे |

मेरे होंटों को मिला लफ्ज़ उस वक़्त कोई
मेरे दुश्मन ने मेरा हाल जो पूछा मुझसे |

ज़िन्दगी तेरे सिवा किससे तआरुफ़ मेरा
और तू ही कहे तू कौन है मेरा, मुझसे |

इतने दुख इतने मसाइल हैं निजी जीवन में
किसको फ़ुर्सत है करे मुल्क का चर्चा मुझसे |

Sunday, 8 June 2014

अप्सरा !

धरती पर नहीं होती अप्सराएँ |

अगर होती हैं
तो किसी के स्वप्न में
या किसी कलमकार की कोरी कल्पना में |

अगर वह अप्सरा होती
तो क्या जन्म से पहले ही मार दी जाती
                             माँ की कोख में ?

अगर वह अप्सरा होती
तो क्या इस तरह सरेराह फूँक दी जाती
                                   तेज़ाब से  ?

अगर वह अप्सरा होती
तो क्या काले शीशों के भीतर नोची-घसोटी जाती
                                   कई भेड़ियों द्वारा  ?

अगर वह अप्सरा होती
तो क्या उसे इतना मजबूर किया जाता
            कि वह अपनी जान ही ले ले ?

नहीं, बिलकुल नहीं
वह अप्सरा नहीं है
कोई नहीं समझता उसे अप्सरा
          उसे महज हाड-मांस का
     एक पुतला समझा जाता है |

एक पुतला जिसे जब चाहो कंधे पर रख लो
                         जब चाहो हासिल कर लो
                                 जब चाहो त्याग दो |

बस, और क्या...

कुछ शब्द कागज़ पर कितने सुहाते हैं            
                          मसलन 'अप्सरा',
           जो हकीकत में वैसे नहीं होते
                           जैसे होने चाहिए,
                                          वाकई |

Thursday, 8 May 2014

यहाँ के रहे न वहाँ के !!

मैंने महसूस किया अपनी नकली कविता की पंक्तियों को
मँहगे आवरण में लिपटे सस्ते माल की तरह,
मैंने लम्बे समय तक धूल से वह वस्तु बचाये रखी
जो शायद उतनी कीमती नहीं थी |

मैंने महसूस किया कि जिसे मैं,
मैं-मैं लिखता रहा
वह अंत में कोई और निकला
जिसे मैं या तो पहचान न सका
या समय के साथ भूल सा गया |

मैंने कागजों पर जिक्र किया सलीके से बने तालाबों का
इस जिक्र में जमीन गाँव की थी
पर तालाब कुछ-कुछ पाँच सितारा होटलों के स्वीमिंग पूल जैसा |

मैंने विदेशी कुत्ते को सहलाते हुए मवेशियों के बारे में रचा
सोफे पर पैर पसारकर कहवा पीते हुए
मैं आलसी बैल की नस्ल को ‘पमेलियन’ तक लिख गया,
मैं अपनी ढोंगी शहरी सभ्यता के चलते गोबर न लिख पाया
मैं डरता रहा अपनी मँहगी कलम के बदबूदार हो जाने से
और इस गंध से सरस्वती के प्राण त्याग देने के भय से |

स्कूल से चुराई हुई रंगीन चौकों का
बुझे बीड़ी के टुकड़ों को फिर से लाल करने का
अपनी कक्षा में फिसड्डी होने का,
मैंने कभी जिक्र करना उचित नहीं समझा
या यूँ कह लें
मैंने ये बातें समझदारी से छिपा ली |

मैं कंचे, गिल्ली-डंडे की बलि चढ़ाकर क्रिकेट-क्रिकेट चिल्लाया
कुछ दिन सिक्कों को सामने बने छिद्र में डालने वाला खेल खेला
माचिस के पत्तों की ताश भी खेली
पत्थरों की बट्टियाँ भी
मौजे से बनी गेंद और पिट्ठू भी,
मगर मैंने बराबर ध्यान रखा कि
मेरा देहातीपन गले में बँधे ताबीज की तरह झाँकने न लगे |

दरअस्ल मैं तुलसी-पीपल तो लिख ही नहीं पाया
स्याही में निब डुबो-डुबोकर
सिर्फ धन-वृक्ष लिखता रहा |

मैं अपनी पैंट के छिद्रों को शब्दों से ढाँपता रहता
जैसे माँ रफू किया करती थी,
मगर मेरे ढाँपनेपन में
वो सलीके वाला रफूपन हमेशा नदारत रहा |

किसान काका के दर्द को लिखते हुए
मैंने अपने गालों पर कुटिल हँसी महसूस की
उसके दर्द की कराह पर
स्वयं के होंठों पर तर्जनी रख दी
और फिर शहरी बनने का स्वाँग करता रहा,
न मेरा अधकचरा शहरीपन उसकी तकलीफ कम कर पाया
न मेरा भीतरी गँवारपन उसकी जान बचा पाया |

मैं भीतर ही भीतर खेत के पुस्तों सा टूटता रहा
किताब की जिल्द सा उधड़ता रहा 
दरकता रहा समुद्रतट पर बनी मूरत जैसा
सावन के धारों सा बहता रहा, अनवरत, अकेला
मैं शहर में रहा खोखली शान से
सम्पन्नता के दरमियान,
मैं विलासिता की सीमा पर  सुखमय जीवन गुजारता रहा
और फिर उसी मँहगी कलम से
‘सी.एफ.एल.’ की दूधिया रौशनी में 
एक गरीब की कविता लिखता रहा |

                                     शीष नैथानी ‘लिल’
                                     हैदराबाद (मई,९/२०१४)


Saturday, 29 March 2014

पहाड़े !

उन दिनों पहाड़े याद करना
मुझे दुनिया का सबसे मुश्किल काम लगता था,
पहाड़े सबसे रहस्यमयी चीज |

९ के पहाड़े से तो मैं हमेशा चमत्कृत रहा
वो मुझे अहसास दिलाता
एक सुसंस्कृत बेटे का
जो घर से बाहर जाकर भी
घर के संस्कार न भूले |

मैं देखता कि कैसे
६ के पहाड़े में आने वाली सँख्यायें
३ के पहाड़े में भी आती
मगर छोटे-छोटे क़दमों में,
मुझे लगता एक पिता
अपने बच्चे की कलाई थामे
१२, १८, २४ वाली धरती पर कदम रख रहा है
और बच्चा
६, ९, १२ वाली धरती पर,
पिता के दो क़दमों के बीच की दूरी
बच्चे के क़दमों की दूरी की दूनी रहती |

१० का पहाड़ा हुआ करता था मासूम
पहली पंक्ति में बैठने वाले बच्चे की तरह
जिसकी ऐनक नाक पर टिकी होती
जो बालों पर कड़वा तेल पोतकर आता
और बाल ख़राब होने पर बहुत रोता था |

१७ का पहाड़ा सबसे बिगड़ैल
गुण्डे प्रवृत्ति  के छात्र की तरह |

शर्दियों में हम धूप में बैठकर गणित पढ़ते
बस्ते में रहती एक पट्टी पहाड़ा
जिसे हम रटते रहते,
मौखिक परीक्षा में १९ का पहाड़ा पूछा जाता
सुनाने पर पूरे २० अंक मिलते |

कभी-कभी नगर में पहाड़ा प्रतियोगिता होती
मैं २५ तक पहाड़े याद करता
और देखता कि कुछ बच्चों को ४२ का भी पहाड़ा याद है,
हालाँकि समय गुजरते उन्हें भी २५ तक ही ठीक से पहाड़े याद रहते |

मुझे २५ के पहाड़े से अगाध प्रेम रहा
जो बरकरार है |

उन दिनों
पहाड़ों की गुनगुनी धूप में
पहाड़े याद करना
जीवन की सबसे बड़ी चुनौती थी |

सोचता हूँ फिर से वे दिन मिल जाएँ
फिर से मिल जाय पीठ पर हाथ फेरती गुनगुनी धूप
मास्टर जी की डाँट,
अबकी बार इन चुनौतियों के बदले
मैं भी ४२ तक पहाड़े याद कर लूँगा
कभी न भूलने के लिये |

शीष नैथानी लिल
मार्च/२९/२०१४ (हैदराबाद)