तिश्नगी

तिश्नगी प्रीत है, रीत है, गीत है
तिश्नगी प्यास है, हार है, जीत है
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Saturday, 21 February 2015

प्रेम के बाद प्रेम !!

प्रसिद्द कैरेबियाई कवि और लेखक डेरेक वॉल्कोट की कविता ‘Love After Love‘ का अनुवाद 

एक समय आएगा
जबकि आनन्द और उत्साह के साथ
तुम अपना अभिवादन करोगे
अपने ही द्वार पर
आईने के सामने
और दोनों मुस्कुराएंगे एक-दूसरे के स्वागत में
उससे कहो, आओ पास बैठो
कुछ खाने के लिए लो.

तुम पुनः अपने भीतर के उस अजनबी से प्रेम करोगे
उसके लिए शराब परोसो, रोटियाँ आगे बढाओ
उसे पुनः अपना दिल दे दो,
उस अजनबी को जिसने तुमसे ताउम्र प्रेम किया था
जिसे तुमने किसी और के लिए अनदेखा कर दिया
जो तुम्हें जानता है सबसे बेहतर.

अलमारियों में रखे प्रेम-पत्र बाहर निकाल फेंको
तमाम तस्वीरें, निराशा में लिखे हुए नोट्स  
आईने से अपनी यह सूरत उधेड़ डालो.
  
आराम से बैठो
और अपने इस अनमोल जीवन का जश्न करो.  

Love After Love - Derek Walcott
अनुवाद – आशीष नैथानी 


Saturday, 17 January 2015

सरहद के आर-पार !!

बनाने वाले ने पहाड़ों से सरहदें बनाई
नदियों से खींची थी लकीरें
मगर आदमी-आदमी के मध्य सरहद आदमी ने रची

रंग की सरहद
भाषा की सरहद
सियासी लिप्साओं की सरहद

सरहदें कितनी भी खौफनाक क्यों न हों
धरती दोनों तरफ एक सी है
एक ही किस्म की मिट्टी
एक ही रंग के पहाड़
एक से जंगल
और एक से इंसान

एक से बच्चे
कमोबेश एक से सपने
बुजुर्गों की एक सी प्रतीक्षारत आँखें
दोनों ओर बन्दूकें लिए एक से सैनिक

उजाले में सरहदें बेहद डरावनी लगती हैं
और रात के समय दिखाई नहीं देती |

Tuesday, 6 January 2015

दिनभर का खबरनामा

एक जवान फिर शहीद हो गया
पिता ने कहा कि नाज है बेटे पर,
साइना नेहवाल ने लड़-झगड़कर पद्म पुरूस्कार हासिल कर लिया |

जारी...

Tuesday, 4 November 2014

लौटना, न लौटना !!

घनी आबादी में रहना समाज में रहना तो नहीं
तकनीकों के मध्य रहना तकनीकी होना भी नही
और अकेला रहना असामाजिक होना तो बिलकुल नहीं

उस काल में पैदा होना
जब कि मिट्टी का रंग आँखें न पहचानती हों
न मालूम हो पकते धान की खुशबू
और हल से हो एक स्थाई अजनबीपन,
रोजी की खोज में शहर आना बाध्यता होती है

मगर यहाँ आना कभी पूरा आना नहीं होता  
न यहाँ से लौटना ही हो पाता है कभी पूरा

व्यस्त घड़ियों में सोमवार की पिछली शाम
शहर में खुश रहने की दलीलें तब साबित होती हैं झूठी
जब एक दोस्त बातों ही बातों में कह उठता है
अपने दिल की बात
कि ‘मैं पहाड़ लौटना चाहता हूँ |’

                          - आशीष नैथानी !!

Sunday, 8 June 2014

अप्सरा !

धरती पर नहीं होती अप्सराएँ |

अगर होती हैं
तो किसी के स्वप्न में
या किसी कलमकार की कोरी कल्पना में |

अगर वह अप्सरा होती
तो क्या जन्म से पहले ही मार दी जाती
                             माँ की कोख में ?

अगर वह अप्सरा होती
तो क्या इस तरह सरेराह फूँक दी जाती
                                   तेज़ाब से  ?

अगर वह अप्सरा होती
तो क्या काले शीशों के भीतर नोची-घसोटी जाती
                                   कई भेड़ियों द्वारा  ?

अगर वह अप्सरा होती
तो क्या उसे इतना मजबूर किया जाता
            कि वह अपनी जान ही ले ले ?

नहीं, बिलकुल नहीं
वह अप्सरा नहीं है
कोई नहीं समझता उसे अप्सरा
          उसे महज हाड-मांस का
     एक पुतला समझा जाता है |

एक पुतला जिसे जब चाहो कंधे पर रख लो
                         जब चाहो हासिल कर लो
                                 जब चाहो त्याग दो |

बस, और क्या...

कुछ शब्द कागज़ पर कितने सुहाते हैं            
                          मसलन 'अप्सरा',
           जो हकीकत में वैसे नहीं होते
                           जैसे होने चाहिए,
                                          वाकई |

Thursday, 8 May 2014

यहाँ के रहे न वहाँ के !!

मैंने महसूस किया अपनी नकली कविता की पंक्तियों को
मँहगे आवरण में लिपटे सस्ते माल की तरह,
मैंने लम्बे समय तक धूल से वह वस्तु बचाये रखी
जो शायद उतनी कीमती नहीं थी |

मैंने महसूस किया कि जिसे मैं,
मैं-मैं लिखता रहा
वह अंत में कोई और निकला
जिसे मैं या तो पहचान न सका
या समय के साथ भूल सा गया |

मैंने कागजों पर जिक्र किया सलीके से बने तालाबों का
इस जिक्र में जमीन गाँव की थी
पर तालाब कुछ-कुछ पाँच सितारा होटलों के स्वीमिंग पूल जैसा |

मैंने विदेशी कुत्ते को सहलाते हुए मवेशियों के बारे में रचा
सोफे पर पैर पसारकर कहवा पीते हुए
मैं आलसी बैल की नस्ल को ‘पमेलियन’ तक लिख गया,
मैं अपनी ढोंगी शहरी सभ्यता के चलते गोबर न लिख पाया
मैं डरता रहा अपनी मँहगी कलम के बदबूदार हो जाने से
और इस गंध से सरस्वती के प्राण त्याग देने के भय से |

स्कूल से चुराई हुई रंगीन चौकों का
बुझे बीड़ी के टुकड़ों को फिर से लाल करने का
अपनी कक्षा में फिसड्डी होने का,
मैंने कभी जिक्र करना उचित नहीं समझा
या यूँ कह लें
मैंने ये बातें समझदारी से छिपा ली |

मैं कंचे, गिल्ली-डंडे की बलि चढ़ाकर क्रिकेट-क्रिकेट चिल्लाया
कुछ दिन सिक्कों को सामने बने छिद्र में डालने वाला खेल खेला
माचिस के पत्तों की ताश भी खेली
पत्थरों की बट्टियाँ भी
मौजे से बनी गेंद और पिट्ठू भी,
मगर मैंने बराबर ध्यान रखा कि
मेरा देहातीपन गले में बँधे ताबीज की तरह झाँकने न लगे |

दरअस्ल मैं तुलसी-पीपल तो लिख ही नहीं पाया
स्याही में निब डुबो-डुबोकर
सिर्फ धन-वृक्ष लिखता रहा |

मैं अपनी पैंट के छिद्रों को शब्दों से ढाँपता रहता
जैसे माँ रफू किया करती थी,
मगर मेरे ढाँपनेपन में
वो सलीके वाला रफूपन हमेशा नदारत रहा |

किसान काका के दर्द को लिखते हुए
मैंने अपने गालों पर कुटिल हँसी महसूस की
उसके दर्द की कराह पर
स्वयं के होंठों पर तर्जनी रख दी
और फिर शहरी बनने का स्वाँग करता रहा,
न मेरा अधकचरा शहरीपन उसकी तकलीफ कम कर पाया
न मेरा भीतरी गँवारपन उसकी जान बचा पाया |

मैं भीतर ही भीतर खेत के पुस्तों सा टूटता रहा
किताब की जिल्द सा उधड़ता रहा 
दरकता रहा समुद्रतट पर बनी मूरत जैसा
सावन के धारों सा बहता रहा, अनवरत, अकेला
मैं शहर में रहा खोखली शान से
सम्पन्नता के दरमियान,
मैं विलासिता की सीमा पर  सुखमय जीवन गुजारता रहा
और फिर उसी मँहगी कलम से
‘सी.एफ.एल.’ की दूधिया रौशनी में 
एक गरीब की कविता लिखता रहा |

                                     आशीष नैथानी ‘सलिल’
                                     हैदराबाद (मई,९/२०१४)


Saturday, 29 March 2014

पहाड़े !

उन दिनों पहाड़े याद करना
मुझे दुनिया का सबसे मुश्किल काम लगता था,
पहाड़े सबसे रहस्यमयी चीज |

९ के पहाड़े से तो मैं हमेशा चमत्कृत रहा
वो मुझे अहसास दिलाता
एक सुसंस्कृत बेटे का
जो घर से बाहर जाकर भी
घर के संस्कार न भूले |

मैं देखता कि कैसे
६ के पहाड़े में आने वाली सँख्यायें
३ के पहाड़े में भी आती
मगर छोटे-छोटे क़दमों में,
मुझे लगता एक पिता
अपने बच्चे की कलाई थामे
१२, १८, २४ वाली धरती पर कदम रख रहा है
और बच्चा
६, ९, १२ वाली धरती पर,
पिता के दो क़दमों के बीच की दूरी
बच्चे के क़दमों की दूरी की दूनी रहती |

१० का पहाड़ा हुआ करता था मासूम
पहली पंक्ति में बैठने वाले बच्चे की तरह
जिसकी ऐनक नाक पर टिकी होती
जो बालों पर कड़वा तेल पोतकर आता
और बाल ख़राब होने पर बहुत रोता था |

१७ का पहाड़ा सबसे बिगड़ैल
गुण्डे प्रवृत्ति  के छात्र की तरह |

शर्दियों में हम धूप में बैठकर गणित पढ़ते
बस्ते में रहती एक पट्टी पहाड़ा
जिसे हम रटते रहते,
मौखिक परीक्षा में १९ का पहाड़ा पूछा जाता
सुनाने पर पूरे २० अंक मिलते |

कभी-कभी नगर में पहाड़ा प्रतियोगिता होती
मैं २५ तक पहाड़े याद करता
और देखता कि कुछ बच्चों को ४२ का भी पहाड़ा याद है,
हालाँकि समय गुजरते उन्हें भी २५ तक ही ठीक से पहाड़े याद रहते |

मुझे २५ के पहाड़े से अगाध प्रेम रहा
जो बरकरार है |

उन दिनों
पहाड़ों की गुनगुनी धूप में
पहाड़े याद करना
जीवन की सबसे बड़ी चुनौती थी |

सोचता हूँ फिर से वे दिन मिल जाएँ
फिर से मिल जाय पीठ पर हाथ फेरती गुनगुनी धूप
मास्टर जी की डाँट,
अबकी बार इन चुनौतियों के बदले
मैं भी ४२ तक पहाड़े याद कर लूँगा
कभी न भूलने के लिये |

आशीष नैथानी ‘सलिल’
मार्च/२९/२०१४ (हैदराबाद)

Thursday, 6 February 2014

कहानी

जब कहानी ख़त्म हो
तो तुम ताली न बजाओ
एकटक देखो मुझे
और खोजो उस नायक को
जो सिर्फ कहानी में रह गया |

Friday, 3 January 2014

शेष !!!

नदियों में जल नहीं बचा
दरख्तों पर नहीं बचे फल-फूल
फलों में स्वाद,
फूलों में महक नहीं बची
धरा पर नहीं बचा धैर्य |

नहीं बची फुदकती गौरैया
जुगनू, तितलियाँ
पहाड़ों पर हिमनद
सुदूर बुग्यालों में नहीं बचे ब्रह्म-कमल |

न बचने की कगार पर है -
खेती योग्य जमीन
मृदा का उपजाऊपन
स्वच्छ हवा-जल
और जीवन |

अब ऐसे में
जब प्रकृति स्वयं अप्राकृतिक हो जाय
मानव हो जाय मशीन
ख़त्म हो जाएँ भावनाएँ इन्सानियत और भाईचारे की,
आदमी के भीतर आदमी और
हिंदुस्तान के भीतर हिंदुस्तान बचे रहने की कल्पना
बेमानी नहीं तो और क्या है |

                    आशीष नैथानी ‘सलिल’

Saturday, 14 December 2013

निवेश

 मैं निवेश कर रहा हूँ अपनी नींदें
तुम्हारे प्यार में,
नफा-नुकसान सोचे बगैर
यूँ भी मुहब्बत कोई सौदा तो नहीं |

मैं जानता हूँ कि वहाँ
तुमने भी जुगनुओं से कर ली होगी दोस्ती,
तारों से जान-पहचान हो चुकी होगी अब तक
और चाँद खिड़की पे बैठ मुस्कुराता रहता होगा |

सूरज की किरणें अखरोट के पेड़ पर चढ़कर
झाँकती होंगी तुम्हारे कमरे में,
और गौरैयों के गाने तुम्हारी नींद में दखल देते होंगे |

अब तो डाकिया भी चिठ्ठियाँ बाँटने में लापरवाही करता होगा,
फ़ोन रखने की सलाह देता होगा,
मगर तुम्हारी उस आदत का क्या
जो यादों को संजोये रखना चाहती है,
ख़त, पैगाम, चिट्ठियों के मार्फ़त |

विश्वास करो,
यहाँ मैं भी कमोबेश उसी हालत में हूँ
शहर की भीड़ में अकेला सा,
जैसे कई कागजों के बीच रह जाता है एक कागज़
दबा हुआ सा,
मुड़ा हुआ सा,
कागजों की तह बिगाड़ता हुआ |

तुम्हारे गाँव और मेरे शहर में
हम दोनों की हालत एक सी है,
एक टूटे हुए पत्ते की माफिक
जिसे इधर की हवा उधर और
उधर की हवा इधर उड़ाने का प्रयास करती है |

खैर...

सुनो ! पिछले हफ्ते भेजा है एक और ख़त मैंने
पढ़ना, सँभालकर रखना या फाड़ देना,
क्या पता किस काम आ जाये ये निरीह ख़त
हँसने-मुस्कुराने के,
अलाव तापने के या फिर
तुम्हारी आँखों की नमी हटाने के |

-- आशीष नैथानी 'सलिल'


Sunday, 17 November 2013

आजाद हैं हम ?

आजाद हैं हम
उस परिंदे की तरह
जो कुछ समय हवा में उड़कर
लौट आता है वापस पिंजरे में |

आजादी ऐसी कि
जिस वाहन में सवार हैं
उस पर अधिकार नहीं,
जिसका अधिकार है
उस पर विश्वास नहीं |

आजादी सड़कों पर नारों के रूप में
पोस्टरों की शक्ल में नजर आती है
और मुँह चिढ़ाती है हमें
कहकर कि, हाँ मैं हूँ |

आजादी अख़बारों की हेडलाइन में
कि चित्रकार की
अभिव्यक्ति की आजादी का हुआ है हनन,
बिहार को मुम्बई तक फैलने की आजादी नहीं |

आज बँधा है इंसान
मवेशी बनकर
आजादी के खूंटे से |

आजादी मौजूद है अब भी
संविधान में, धर्म की किताबों में
हकीकत में बिलकुल नहीं |

ये आजादी बेहद मँहगी शै है दोस्तों !


आशीष नैथानी सलिल
नवम्बर १५/२०१३
हैदराबाद  !!
 


Friday, 20 September 2013

बदलाव

शहद, धूप, छाँव, घाव
सब कुछ देखा है,
जिन्दगी ने
समय के सापेक्ष
बड़ा बदलाव देखा है |

जो नहीं समझते
इन्सान को इन्सान भी,
उनके घर में
विदेशी कुत्तों से
विशेष लगाव देखा है ||


तिश्नगी से...



Thursday, 15 August 2013

आज तलाश पूरी हुई

तुम्हें क्या लगता है
मैं वापस उस जगह नहीं गया
जहाँ आशियाना था तुम्हारा
और मंदिर का रास्ता गुजरता था
ठीक तुम्हारे घर के सामने से ।

हाँ, मैं तब कुछ ज्यादा ही
धार्मिक हुआ करता था
या कहें, धार्मिक बन गया था;
मेरा मंदिर, पूजालय तो मंदिर से
कुछ पहले ही था,
मंदिर तो जाता था
चंद मन्नतें माँगने के लिए,
हाँ, खुदगर्जी तो थी ही
क्या करें, उम्र ही ऐसी थी ।

और याद है एक दिन
जब मैं मंदिर के मुख्य द्वार से
भीतर प्रवेश कर रहा था,
तुम अचानक नजर आ गई थी
मंदिर से बाहर निकलते हुए,
शायद तुम्हें याद न हो
पर मुझे है,
बल्कि मैं तो भूला ही नहीं ।

फिर जब मैं वापस शहर लौटा
तो उसी मोहल्ले गया
जहाँ की हवा कभी तुम्हारे अहसास की
खुशबू से सराबोर रहती थी,
वही गलियाँ, वही घर, वही मंदिर
घर के आगे बाईं ओर खड़ा वही खुबानी का युवा पेड़,
पर न जाने क्यों शांति न मिली
साँसें उखड़ी-उखड़ी सी लगी; 
पता चला तुम शहर छोड़कर जा चुकी हो
दूर किसी और शहर में।

दिन का रात में
और रात का दिन में तब्दील होना
मेरे लिए वर्षों के बदलने जैसा था,
सच में,
इतना ही दुखदायी और इंतिजार भरा ।

पर दिन गए, महीने गए और
कई साल भी गए;
इस दौरान उम्र बदली, सूरत बदली
और काम-धाम भी बदल गया;
अगर कुछ नहीं बदला तो तुम्हारा इंतिजार | 

मेरी गाडी अक्सर गुजरा करती
तुम्हारे शहर के किनारे से बने बाईपास से
और मुझे अपनी जिंदगी बाईपास होती नजर आती ।

क्रमश: .......

Monday, 29 July 2013

फीकापन

एक लम्बी रात
जो गुजरती है तुम्हारे ख्वाब में,
तुम्हें निहारते हुए
बतियाते हुए
किस्से सुनते-सुनाते हुए ।

और जब ये रात ख़त्म होती है,
सूरज की किरणें
मेरे कमरे में बने रोशनदानों से
झाँकने लगती हैं,
मेरी नींद टूट जाती है तब ।

तुम्हारे ख्वाब के बाद
नींद का इस तरह टूट जाना,
महसूस होता है गोया
कि जायकेदार खीर खाने के बाद
कर दिया हो कुल्ला,
और मुँह में शेष रह गया हो
महज फीकापन ।