तिश्नगी

तिश्नगी प्रीत है, रीत है, गीत है
तिश्नगी प्यास है, हार है, जीत है
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Friday, 20 September 2013

बदलाव

शहद, धूप, छाँव, घाव
सब कुछ देखा है,
जिन्दगी ने
समय के सापेक्ष
बड़ा बदलाव देखा है |

जो नहीं समझते
इन्सान को इन्सान भी,
उनके घर में
विदेशी कुत्तों से
विशेष लगाव देखा है ||


तिश्नगी से...



Saturday, 29 June 2013

तिश्नगी - विमोचन समारोह


















परम आत्मीय स्वजन,

सादर अभिवादन ।

आप सभी को यह सूचित करते हुए मुझे अत्यंत हर्ष की अनुभूति हो रही है कि आगामी ७ जुलाई, २०१३ रविवार को मेरी प्रथम काव्य-कृति 'तिश्नगी' का विमोचन साहित्यिक-संस्था 'साहित्य-मंथन' के तत्वाधान में होना सुनिश्चित हुआ है। दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद के अध्यक्ष एवं प्राचार्य प्रो. ऋषभ देव जी शर्मा के कर-कमलों द्वारा पुस्तक विमोचित होगी।

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता हैदराबाद से प्रकाशित भारतीय भाषा, संस्कृति एवं विचारों की प्रतिनिधि मासिक पत्रिका 'भास्वर-भारत' के संपादक डॉ. राधेश्याम जी शुक्ल करेंगे तथा अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. एम. वेंकटेश्वर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे।

इस कार्यक्रम में आप सभी साहित्यप्रेमियों एवं मित्रों की उपस्थिति प्रार्थनीय है।

दिन व समय - 7 जुलाई, 2013 - रविवार - (सायं - 4:00 बजे )
स्थान - सम्मेलन कक्ष, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, खैरताबाद - हैदराबाद - 500 004 (निकट - खादी भण्डार एवं Visual Photo Studio)



Facebook Event Link

 

 - निवेदक
आशीष नैथानी
हैदराबाद
9666 060 273

Wednesday, 9 January 2013

शहर में !!!

अँधेरी रात में,
रोशन सुबह का खाब अच्छा है ।
बच्चे के चेहरे पे हँसी है,
शहर में,
कुछ तो जनाब अच्छा है ।।


Sunday, 6 November 2011

तुम और मैं !!!

तुम हो चन्दा, मैं गगन हूँ,
तुम हो पानी, मैं पवन हूँ ।
तुम धरा हो, मैं वतन हूँ,
तुम मुहब्बत, मैं अमन हूँ ॥

तुम पलक हो, मैं नयन हूँ,
तुम हो सपना, मैं शयन हूँ ।
तुम हो पावक, मैं तपन हूँ,
तुम शरारा, मैं अगन हूँ ॥

तुम हो पीड़ा, मैं चुभन हूँ,
तुम अमानत, मैं अमन हूँ ।
तुम हो खुश तो मैं मगन हूँ,
बिन तुम्हारे मैं कफ़न हूँ ॥

[ काव्य-संग्रह "तिश्नगी" से ]


Friday, 1 July 2011

भाई


पलकों से गिरता हर आँसू,
मुड़कर ये कहता है
कोई मेरा अपना भी,
ज़न्नत में रहता है ।।

यादें जिसकी पास मेरे और 
जिस्म पराया सा
फिर भी दिल तन्हा-तन्हा,
तन्हाई सहता है ।।

सीखी जिससे रिश्तेदारी,
रस्मों की बुनियादें
वो खुद ही रिश्तों से अब,
मुँह फेरे रहता है ।।

सोच रहा था इस बार करूँगा,
गहरे राज की बातें  
क्या मालूम कि राज हमेशा,
राज ही रहता है ।।

मुझको जिस पर ऐतबार कुछ,
खुद से ज्यादा 'भाई'
होकर रुखसत राख - राख,
गंगा में बहता है
कोई मेरा अपना भी,
ज़न्नत में रहता है ।।

Monday, 20 June 2011

उनकी मुस्कुराहट

मैं राह के इस तरफ
वो उस तरफ,
मैं उनसे नज़र मिलाता हूँ
वो भी नज़र मिलाती है,
फ़िर मुस्कुराती है
वाह ! क्या ग़जब ढाती है ।।

हवा के तेज झोंके से 
पत्ता जमीन पर गिरता है,
मैं पत्ते को उठाता हूँ
वो नज़र चुराती है,
फ़िर मुस्कुराती है 
वाह ! क्या ग़जब ढाती है ।।

उसकी तस्वीर बनाने को मैं
एक कलम उठाता हूँ,
वो जुल्फ़ें सँवार लेती है
जैसे हो तैयार इस चित्रकारी के लिये,
फ़िर मैं मुस्कुराता हूँ
फ़िर मुस्कुराती है
वाह ! क्या ग़जब ढाती है ।।

मैं उसे उसकी तस्वीर दिखाता हूँ
वो गुस्से से चिल्लाती है और,
और हसीं हो जाती है
फ़िर मुस्कुराती है 
वाह ! क्या ग़जब ढाती है ।।

मैं उससे मिलने को कदम बढ़ाता हूँ
वो भी खुश हो कदम बढ़ाती है,
तभी बीच में दुश्मन गाड़ी जाती है
और वो गाड़ी में चढ़ जाती है,
गाडी आगे बढ़ जाती है
मैं उदास, हताश, निराश हो जाता हूँ
तभी वो खिड़की से हाथ हिलाती है
मैं भी हाथ हिलाता हूँ,
फ़िर मुस्कुराता हूँ
फ़िर मुस्कुराती है
वाह ! क्या ग़जब ढाती है ।।