तिश्नगी

तिश्नगी प्रीत है, रीत है, गीत है
तिश्नगी प्यास है, हार है, जीत है
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Monday, 22 June 2015

फागुन की पूनम को कैसा घना अँधेरा फैला है

सूरजमुखी तके न सूरज
इन्द्रधनुष बेरंग हो जाये
सब पंछी लौटें घर को पर
होली आयी, पिया न आये

तनातनी की हालत है, सीमा पर मौसम मैला है
फागुन की पूनम को कैसा घना अँधेरा फैला है ।।

मुल्क, मुल्क सा नहीं रहा
अब रंग, रंग सा नहीं रहा
पिचकारी उगले जहरीला
पानी, पानी सा नहीं रहा

आज स्वाद गुझिया का कितना तीखा और कसैला है
फागुन की पूनम को कैसा घना अँधेरा फैला है ।।

सरहद पर जब बरसी गोली
कैसा फागुन, कैसी होली
सर उखाड़कर साथ ले गयी
दुष्ट 'पाक' आतंकी टोली

आँचल 'वीर' की विधवा का, रो-रोकर मटमैला है
फागुन की पूनम को कैसा घना अँधेरा फैला है ।।

आशीष नैथानी 'सलिल'
हैदराबाद


Tuesday, 19 November 2013

यही वो कह रही है !!!

नहीं उतरी धरा पर, फिर भी क्या-क्या सह रही है |
मुझे हो जाने दो पैदा यही वो कह रही है ||

मैं माँ तेरा, खिलौना हूँ, मुझे बाँहों में रखना
मैं बाबूजी, हूँ खुशबू सी, मुझे साँसों में रखना,
मैं बनकर तितलियों सी, घर में उड़ना चाहती हूँ
अपने भाईयों से जी भरके लड़ना चाहती हूँ ।

टूटकर बेटी कैसे कतरा-कतरा बह रही है ।
मुझे हो जाने दो पैदा यही वो कह रही है ||

मैं जुगनू बन उडूँगी लेके अपने हौंसले को
प्यार से सजा लूँगी माँ, अपने घर के घौंसले को
मैं तुम्हारी गोद में, बर्फ सी मिलना चाहती हूँ
पुरानी शाख पर नये पुष्पों सी खिलना चाहती हूँ  ।

बाढ़ सी बेटी किनारे तोड़ आगे बह रही है ।
मुझे हो जाने दो पैदा यही वो कह रही है ||

पहाड़ों पर सुबह जैसी, मुझे घर में आने दो माँ
नदियों के हरे जल सी, आँखों में समाने दो माँ,
मुझे भी सुननी है दादी-औ-नानी से कहानियाँ
मुझे रोने दो जी भरकर, जी भरकर रुलाने दो माँ ।

अजन्मी कली, बसन्त में बरसात सी बह रही है  ।
मुझे हो जाने दो पैदा यही वो कह रही है |
मुझे हो जाने दो पैदा यही वो कह रही है ||



Thursday, 25 April 2013

नववर्ष !!!

तिथि खोई, पंचांग खो गये
'कैलैंडर' गृहवासी हो गये ।
गणना शुरू  'कैलकुलेटर' पर 
चन्दा, सूरज गैर हो गये ॥

ग्रहों की बदली सी चाल है
सच में ये ही नया साल है ॥१॥ 
लोकगीत और नृत्य पुराने
बोली-भाषा-गाँव बेगाने ।
मिट्टी की खुशबू भी रूठी
रूठे घर-संसार-ज़माने ॥

अश्कों से भीगा रुमाल है
सच में ये ही नया साल है ॥२॥

पिछले बरस दामिनी खोई
अबके बरस भी गुडिया रोई ।
इधर-उधर सब काँटे बिखरे
जाने किसने फसल ये बोई ॥

गली-सड़क पर बुरा हाल है
सच में ये ही नया साल है ॥३॥

आशीष नैथानी 'सलिल'
25/4/2013..[हैदराबाद]
 

Wednesday, 20 February 2013

आज हुए ऋतुराज पहेली

आज हुए ऋतुराज पहेली,
पूष ने थामी सावन की हथेली ।
आज हुए ऋतुराज पहेली ।।

सूरज बदले समय दिन-ब-दिन
चन्दा अपना तन बदले,
पुरवाई बदले शीतलता
अम्बर अपने घन बदले ।

स्वर्णिम गेंहूँ की बाली से
खेले मौसम अठखेली ।
आज हुए ऋतुराज पहेली ।। 1 ।।

कब नव कोंपल लाते तरुवर
पंछी को ललचाते तरुवर
तेज हवा जब तोड़े शाखा,
मौसम पर गुर्राते तरुवर ।

चट्टानों पर 'फ्योंली' चमके
और तलहटी खिले चमेली ।
आज हुए ऋतुराज पहेली ।। 2 ।।

कभी लू चले, कभी कुहासा
ऊष्म किरण की झूठी आशा,
कभी कंपकंपी कभी पसीना
इस मौसम से घोर निराशा ।

और छिपें तारे बादल में
जैसे दुल्हन नई-नवेली ।
आज हुए ऋतुराज पहेली ।। 3 ।।


'टिप्पणी : 'फ्योंली', हिमालय की तलहटी में उगने वाला पीले रंग का छोटा सा सुन्दर पुष्प होता है और इसे गढ़वाली भाषा (बोली) में यह नाम दिया गया है । 
 

Thursday, 17 January 2013

मैं बसन्त, फिर आऊँगा !!!

जब ऊषा की श्वेत किरन
गुनगुना अहसास दिलायेगी,
जब ठण्डी-शीतल पुरवाई
अपनी चुभन घटायेगी,
जब बरखा की बूँद-बूँद फिर
प्रीत का पाठ पढ़ायेगी,

मैं भी अपने अहसासों की,

सच्ची कथा सुनाऊँगा ।
मैं बसन्त, फिर आऊँगा  ।।

जब वृक्षों पर बने घरौंदे

तिनके-तिनके टूट गये,
जब तितली के नाजुक रिश्ते
बागीचों से छूट गये,
और मधुप, मधु की खातिर जब
काँटों को ही लूट गये,

तब मैं सूखी शाखों पर फिर,
नये पुष्प बिखराऊँगा ।
मैं बसन्त, फिर आऊँगा ।।


जब भीमकाय
यायावर नीरद
तन का वजन घटायेगा,
जब ये समय ठिठुर-ठिठुरकर
अपने संवाद सुनायेगा,
और चकोर घायल होकर जब
चंदा से ना मिल पायेगा,

मैं उस बेवस पंछी को कुछ,
नये पँख पहनाऊँगा ।
मैं बसन्त, फिर आऊँगा ।।