तिश्नगी

तिश्नगी प्रीत है, रीत है, गीत है
तिश्नगी प्यास है, हार है, जीत है

Monday, 22 June 2015

फागुन की पूनम को कैसा घना अँधेरा फैला है

सूरजमुखी तके न सूरज
इन्द्रधनुष बेरंग हो जाये
सब पंछी लौटें घर को पर
होली आयी, पिया न आये

तनातनी की हालत है, सीमा पर मौसम मैला है
फागुन की पूनम को कैसा घना अँधेरा फैला है ।।

मुल्क, मुल्क सा नहीं रहा
अब रंग, रंग सा नहीं रहा
पिचकारी उगले जहरीला
पानी, पानी सा नहीं रहा

आज स्वाद गुझिया का कितना तीखा और कसैला है
फागुन की पूनम को कैसा घना अँधेरा फैला है ।।

सरहद पर जब बरसी गोली
कैसा फागुन, कैसी होली
सर उखाड़कर साथ ले गयी
दुष्ट 'पाक' आतंकी टोली

आँचल 'वीर' की विधवा का, रो-रोकर मटमैला है
फागुन की पूनम को कैसा घना अँधेरा फैला है ।।

आशीष नैथानी 'सलिल'
हैदराबाद


Friday, 29 May 2015

पंछियों के घर लुटे और लोग बेघर हो गए !!

पंछियों के घर लुटे और लोग बेघर हो गए
ज़लज़ला आया तो ऐसा ख़ाब बंजर हो गए

घर बनाये ईंट, आँसू, ख़ाब, पत्थर जोड़कर
फिर से वापस ईंट, आँसू, ख़ाब, पत्थर हो गए

मिट गयी दौलत की दूरी, भेद जीवन-मृत्यु का
एक कम्पन से प्रजा-राजा बराबर हो गए

मंदिरों के बुत रहे ख़ामोश तो फिर यूँ हुआ
त्रासदी में फ़ौज के जांबाज़ ईश्वर हो गए

रम गए हैं खेल में, है नाम जिसका ज़िन्दगी
चंद साँसों के खिलौने जब मयस्सर हो गए

आशीष नैथानी 'सलिल' !!
हैदराबाद

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Friday, 1 May 2015

दो नए शेर !!

मंदिरों के बुत रहे ख़ामोश सब कुछ देखते
त्रासदी में फ़ौज़ के जाँबाज़ ईश्वर हो गए |

रम गए इस खेल में हम नाम जिसका ज़िन्दगी
चंद साँसों के खिलौने जब मयस्सर हो गए ||

-आशीष नैथानी 

Friday, 3 April 2015

नज़्म !!

ज़िन्दगी तेरे ख़ज़ाने में ख़ज़ाने लाखों
ज़िन्दगी, राज़ के भीतर हैं छिपे राज़ कई
हमको उम्मीद दरख्तों पे लगेंगे फल-फूल
हमको मालूम बहार आएगी दौड़े-दौड़े
फिर परिंदों के नशेमन में बजेगा संगीत
फिर से खेतों में हरी फस्ल उगेगी हरसू    

ज़िन्दगी खेल नहीं दर्द का आसाँ होना
बात ही बात में यूँ तेरा परेशाँ होना
शोरगुल में जो दबे ऐसी भी आवाज़ नहीं
मंजिलों तक न पहुँच पाए वो परवाज़ नहीं
ज़िन्दगी यूँ तो नहीं कोई मुसाफ़िरखाना
फिर भी कुछ रोज़ तसल्ली से गुजारे जाएँ 

धूप जब रेत में लेटे हुए बच्चों पे लगे
जिस्म चमके कि कहीं गुल पे रखी हो शबनम
उफ़ ! ये शबनम का सफ़र चंद घडी का है फ़क़त
और बच्चों की है उस रेत से यारी गहरी
इतनी कोशिश तो हो बचपन को सँवारा जाए
ज़िन्दगी क़र्ज़ है, यह क़र्ज़ उतारा जाए

ज़िन्दगी देख रहा हूँ तेरे चेहरे क्या-क्या 
ज़िन्दगी सीख रहा हूँ मैं म'आनी तेरे ||









आशीष नैथानी 'सलिल'
अप्रैल.२/२०१५
हैदराबाद !!

Wednesday, 4 March 2015

होली में !!

तेरा मेरा भेद मिटा दें होली में
ये दुनिया रंगीन बना दें होली में

सुबह-सुबह आवाज़ पडोसी तक पहुँचे
सूने-सूने हर घर में दस्तक पहुँचे
मुठ्ठी भर-भर रंग लगाएँ जश्न करें
रंगीला त्यौहार मनाएँ जश्न करें |

गलियों में खुशबू बिखरा दें होली में
ये दुनिया रंगीन बना दें होली में ||

ढोल की थाप पे नाचें सब नर और नारी
मुँह ताके, सर पीटे नफ़रत बेचारी
रंग अबीर गुलाल उड़े बादल के संग
बच्चे युद्ध करें भर-भरकर पिचकारी |

शर्बत में कुछ भंग मिला दें होली में
ये दुनिया रंगीन बना दें होली में ||

क्या पूरब क्या पश्चिम क्या उत्तर-दक्षिण
दौलत साँसों की गुजरे घड़ियाँ गिन-गिन
गाँवों ने देखे हैं पतझड़ अपनों के
शहरों की सरहद पर मृत तन सपनों के |


गांवों को जीवन लौटा दें होली में
ये दुनिया रंगीन बना दें होली में ||