तिश्नगी

तिश्नगी प्रीत है, रीत है, गीत है
तिश्नगी प्यास है, हार है, जीत है

Thursday, 25 April 2013

तुम लौट आओगे !

तुम लौट आओगे !
नहीं ! तुम नहीं लौटोगे
तुम लौट आओगे !
नहीं ! तुम नहीं लौटोगे
तुम लौट आओगे…..

गुलाब की एक-एक पंखुड़ी
तोड़कर पूछा मैंने ।

और फिर फ़ेंक दिया गुल
'सब बकवास है' कहकर,
जब बच गई थी
आख़िरी तीन पंखुड़ियाँ,
और मेरे लबों पर शब्द थे -
तुम लौट आओगे ।

-आशीष नैथानी 'सलिल'
हैदराबाद (अप्रैल,7/2013)















Sunday, 31 March 2013

ग़ज़ल - अपनी चादर !!!

अपनी चादर रख झोले में वापस लौट चला हूँ मैं
जो मिट्टी पगली मुझको, जिस मिट्टी का पगला हूँ मैं ।

क्या तारे क्या चन्दा-सूरज सब फीके-फीके से हैं
आज अँधेरी रात को जैसे जुगनू बन निकला हूँ मैं ।

ख़ाब जलेंगे, आँख शमा सी और जिगर होगा धुआँ
अपने और परायों के इस जग में खूब जला हूँ मैं ।

आज मराशिम टूटेंगे, टूटेगी यारी मतलब की
इन रिश्तों के नाम पे जाने कितनी बार छला हूँ मैं ।

वो आये कहने हमसे क्यों बदले-बदले रहते हो
हाँ जबसे देखा तुमको, थोडा-थोडा बदला हूँ मैं ।

एक 'सलिल' बेरंग हुआ पर कर डाले रंगीन कई
काली-काली सूरत में बस थोडा सा उजला हूँ मैं ।

Tuesday, 19 March 2013

अब यहाँ आराम ही आराम है !!!

जगमगाते शह्र की इक शाम है
जिन्दगी फिरसे तुम्हारे नाम है ।

मेरे हाथों में है गुल की पंखुड़ी
और दिल में इश्क का पैगाम है ।

है नशा कुछ और ही इस याद में
ये भजन, गीता, जुबाँ पर राम है ।

गेसुओं की छांह में आकर लगा
अब यहाँ आराम ही आराम है ।

तुम न आये, मैं रहा चौराह पर
इश्क का कैसा हुआ अंजाम है ।

अब न दो तालीम इज्जत की 'सलिल'

यूँ भी तुमपर प्रीत का इल्जाम है ।

Wednesday, 20 February 2013

आज हुए ऋतुराज पहेली

आज हुए ऋतुराज पहेली,
पूष ने थामी सावन की हथेली ।
आज हुए ऋतुराज पहेली ।।

सूरज बदले समय दिन-ब-दिन
चन्दा अपना तन बदले,
पुरवाई बदले शीतलता
अम्बर अपने घन बदले ।

स्वर्णिम गेंहूँ की बाली से
खेले मौसम अठखेली ।
आज हुए ऋतुराज पहेली ।। 1 ।।

कब नव कोंपल लाते तरुवर
पंछी को ललचाते तरुवर
तेज हवा जब तोड़े शाखा,
मौसम पर गुर्राते तरुवर ।

चट्टानों पर 'फ्योंली' चमके
और तलहटी खिले चमेली ।
आज हुए ऋतुराज पहेली ।। 2 ।।

कभी लू चले, कभी कुहासा
ऊष्म किरण की झूठी आशा,
कभी कंपकंपी कभी पसीना
इस मौसम से घोर निराशा ।

और छिपें तारे बादल में
जैसे दुल्हन नई-नवेली ।
आज हुए ऋतुराज पहेली ।। 3 ।।


'टिप्पणी : 'फ्योंली', हिमालय की तलहटी में उगने वाला पीले रंग का छोटा सा सुन्दर पुष्प होता है और इसे गढ़वाली भाषा (बोली) में यह नाम दिया गया है । 
 

Sunday, 3 February 2013

दस्तख़त

दिल के कोरे काग़ज पर ये तुमने कैसे बोल लिखे
मीठी आँखों से दो आख़र प्रीत के जब अनमोल लिखे,
ख़त के नीचे किये दस्तख़त उलझी लट को सुलझाकर
और मधुप बन मधु के मोती मीठे और बेमोल लिखे ।