तिश्नगी

तिश्नगी प्रीत है, रीत है, गीत है
तिश्नगी प्यास है, हार है, जीत है

Friday, 14 December 2012

प्रीत का गीत (12/12/12)

सखी, पिया परदेश गये हैं ।
छोड़ यही सन्देश गये है ।।

महिने दो महिने हो आये,
उनके आने की आस लगाये ।
तकती रस्ता शाम - सवेरे,
पर वापस कोई ना आये ।
ना आँसू आँखों में छाये,
बता यही निर्देश गये हैं ।
सखी, पिया परदेश गये हैं ।।

दिन - महिने मुश्किल से बीते,
राशन के बर्तन भी रीते ।
घर - पनघट सब बंजर- बंजर,
होंठ बेचारे खुद को सीते ।
ये जुगनू अंधियारा पीते,
सुना हमें उपदेश गये हैं ।
सखी, पिया परदेश गये हैं ।

बेसुरी हुई कोयल की बोली,
बेरंग मनी थी अबकी होली ।
बिस्तर पर करवट और सिलवट,
और यादों ने याद टटोली ।
कैसी सेहत, कैसी झोली ?
जाने कैसे देश गये हैं ।
सखी, पिया परदेश गये हैं ।

[काव्य-संग्रह "तिश्नगी" से]
 

Saturday, 24 November 2012

इस दफा इश्क आजमाया है !!!

रुख से परदा जो तुमने हटाया है,
दर-ए-दिल किसी ने खटकाया है ।

मेरी तकदीर है बुलन्दी पर,
जबसे हाथों में हाथ आया है ।

छोटी-छोटी हसीन बातों ने,
दिल में रूतबा बड़ा बनाया है ।

दे जहर-जाम-जखम, कुछ भी दे,
खुद को तेरी राह में बिछाया है ।

आजमाये हैं यूँ तो दर्द कई,
इस दफा इश्क आजमाया है ।

Saturday, 17 November 2012

पहाड़ों पर सुबह !

हल्की ठण्डी हवा चलती है जब
ओंस की बूँद
गुलाब की पंखुड़ी पर अँगड़ाई लेती है

कोयलों का कलरव भी हो जाता है शुरू

सुथरे नीले अम्बर पर
पहाड़ों के कन्धों से
निकलता है सूरज सफर पर

पत्थरों की धमनियों में दौड़ने लगता है रक्त
माटी होने लगती है मुलायम
देवदार रगड़ता है हथेलियाँ

महीने की किताब का एक पन्ना पलट दिया जाता है
नया चटख पन्ना

पहाड़ों पर हर सुबह बड़ी हसीन होती है |

Monday, 22 October 2012

मोहब्बत के गम !!!

कुदरत के कुछ फैसले बड़े अजीब होते हैं |
मोहब्बत के गम तकदीरवालों को नसीब होते हैं ||

जो होते हैं जाँ से बढ़कर एक दौर में,
वही आशिक एक रोज रकीब होते हैं |

दोस्त कुछ ऐसे भी हैं जो खंजर लिये फिरते हैं,
होते हैं कुछ दुश्मन जो बड़े नजीब होते हैं |

'सलिल' इस म्यान के नसीब को क्या कहें ?
बचाने वाले खतरे के कितने करीब होते हैं |
कुदरत के कुछ फैसले बड़े अजीब होते हैं ||
-----------------------आशीष नैथानी 'सलिल'-----------------------

Monday, 8 October 2012

किस वजह ?

किस वजह मैं सुधर जाऊं,
क्या पता फिर मुकर जाऊं |
बाँध ले बन्धन में मुझको
ना खबर फिर किधर जाऊं ||
सामने ही है खड़ी तू ,
और पीछे आईना है |
नासमझ मैं सोचता हूँ,
इधर जाऊं या उधर जाऊं ||


[काव्य-संग्रह "तिश्नगी" से]