तिश्नगी

तिश्नगी प्रीत है, रीत है, गीत है
तिश्नगी प्यास है, हार है, जीत है

Friday, 4 December 2015

तेरी गली से लौटके जाना पड़ता है

तेरी गली से लौटके जाना पड़ता है
हम दोनों के बीच ज़माना पड़ता है

प्यार-मुहब्बत इश्क़-ख़ुमारी के ख़ातिर
मन्दिर-मस्ज़िद शीष नवाना पड़ता है

जिस जानिब इक भीड़ चले दीवानों की
समझो उस जानिब मैख़ाना पड़ता है

सब पंछी उस आँगन में मँडराते हैं
जिस आँगन में आबोदाना पड़ता है

मर जाते हैं होंठों के सारे अल्फ़ाज़
अपनों को जब दर्द सुनाना पड़ता है

दिल बच्चा है, अक्सर बुनता है सपने
क़दमों को इक दिन थक जाना पड़ता है

- आशीष नैथानी !!

Thursday, 3 December 2015

सबका साथ निभाता चल

सबका साथ निभाता चल
सबसे हाथ मिलाता चल

गर खामोशी साथ चले
लफ़्ज़ों को दुहराता चल

Wednesday, 2 December 2015

चेन्नई में सैलाब

बारिशें बन्द हो जाएँ
सुख की धूप खिले
घर-घर में जल-भोजन पहुँचे
लोग स्वस्थ रहें
जीवन लौट आये पटरी पर
स्कूल खुलें, बच्चे स्कूल जाएँ
कामगार ऑफिस या अन्य कामों पर
सड़कें, प्लेटफॉर्म, एयरपोर्ट खुलें
समस्याओं के बादल छँटें
इसी दुआ के साथ !!

|| ‪#‎PrayForChennai‬ || ‪#‎ChennaiFloods‬ ||

Monday, 30 November 2015

समय के बाद - सब कुछ खाक !!

एक महल था. महल से लगकर एक झोपड़ी थी.  झोपड़ी में एक बूढा रहता था जिसके पास एक खटिया, दो जोड़ी कपड़े और तीन मुर्गियाँ थी. महल में बहुत कुछ था.

हर रात की तरह उस रात सब सोये हुए थे. हवा चल रही थी और चाँद जग रहा था. झोपडी में आग लग गयी. बाँस की दीवारों से लेकर फूस की छत तक, सब जल गए. बूढ़े की आँख खुली तो मुर्गियों को बचा ले आया. झोपडी की आग महल तक पहुँच गयी और फिर...

अगली सुबह, मैदान पर राख के दो टीले मिले. एक बड़ा, एक छोटा. महल का मालिक और वह बूढा अगल-बगल खड़े थे. दोनों के तन पर एक जोड़ी कपड़े थे. मुर्गियाँ दाना खोज रही थी. महल-झोपडी की हकीकत हवा के साथ उड़ गयी. बड़े टीले से अब थी धुँआ रिस रहा था.

उस शाम, बूढ़े ने एक और झोपड़ी बना ली. बीड़ी से तौबा कर ली. महल का मालिक झोपड़ी के भीतर बूढ़े के बगल में सो गया.

                                       आशीष नैथानी | हैदराबाद | नवम्बर-३०/२०१५

   


Friday, 9 October 2015

ग़ज़ल - आदत बिगड़ गयी !

आदत बना चुके थे कि आदत बिगड़ गयी
वो इस तरह गए कि तबीयत बिगड़ गयी

किस्से-कहानियों का असर इस कदर हुआ
जीवन के कागजों की हकीक़त बिगड़ गयी