तिश्नगी

तिश्नगी प्रीत है, रीत है, गीत है
तिश्नगी प्यास है, हार है, जीत है

Friday, 14 June 2013

ग़ज़ल !!!

दवा से दर्द औ' दिल से वो इक चेहरा छुपाते हैं ।
वो कैसे हैं अदावत भी जो शिद्दत से निभाते हैं ॥

यही थी शर्त जीने की, कि फिर वापस न लौटेंगे ।
मगर सच ये कि वो अब भी ख़यालों में सताते हैं ॥  

हुआ अहसास इतना ही जो तोडा गुल को टहनी से ।
किसी की मुस्कुराहट को किसी का घर जलाते हैं ॥

पतंग उड़ती हवा में ज़िन्दगी की कटके गिरनी है ।
ये हमको देखना होगा, किसे कैसे बचाते हैं ॥

मुहब्बत में नसीब इतना हुआ तुमको 'सलिल' कहना ।
अजल की राह के काँटे भी अब मरहम लगाते हैं ॥

[[ अदावत - दुश्मनी,   अजल - मृत्यु ]]

आशीष नैथानी 'सलिल'... जून,५/२०१३ (हैदराबाद)










Thursday, 25 April 2013

नववर्ष !!!

तिथि खोई, पंचांग खो गये
'कैलैंडर' गृहवासी हो गये ।
गणना शुरू  'कैलकुलेटर' पर 
चन्दा, सूरज गैर हो गये ॥

ग्रहों की बदली सी चाल है
सच में ये ही नया साल है ॥१॥ 
लोकगीत और नृत्य पुराने
बोली-भाषा-गाँव बेगाने ।
मिट्टी की खुशबू भी रूठी
रूठे घर-संसार-ज़माने ॥

अश्कों से भीगा रुमाल है
सच में ये ही नया साल है ॥२॥

पिछले बरस दामिनी खोई
अबके बरस भी गुडिया रोई ।
इधर-उधर सब काँटे बिखरे
जाने किसने फसल ये बोई ॥

गली-सड़क पर बुरा हाल है
सच में ये ही नया साल है ॥३॥

आशीष नैथानी 'सलिल'
25/4/2013..[हैदराबाद]
 

तुम लौट आओगे !

तुम लौट आओगे !
नहीं ! तुम नहीं लौटोगे
तुम लौट आओगे !
नहीं ! तुम नहीं लौटोगे
तुम लौट आओगे…..

गुलाब की एक-एक पंखुड़ी
तोड़कर पूछा मैंने ।

और फिर फ़ेंक दिया गुल
'सब बकवास है' कहकर,
जब बच गई थी
आख़िरी तीन पंखुड़ियाँ,
और मेरे लबों पर शब्द थे -
तुम लौट आओगे ।

-आशीष नैथानी 'सलिल'
हैदराबाद (अप्रैल,7/2013)















Sunday, 31 March 2013

ग़ज़ल - अपनी चादर !!!

अपनी चादर रख झोले में वापस लौट चला हूँ मैं
जो मिट्टी पगली मुझको, जिस मिट्टी का पगला हूँ मैं ।

क्या तारे क्या चन्दा-सूरज सब फीके-फीके से हैं
आज अँधेरी रात को जैसे जुगनू बन निकला हूँ मैं ।

ख़ाब जलेंगे, आँख शमा सी और जिगर होगा धुआँ
अपने और परायों के इस जग में खूब जला हूँ मैं ।

आज मराशिम टूटेंगे, टूटेगी यारी मतलब की
इन रिश्तों के नाम पे जाने कितनी बार छला हूँ मैं ।

वो आये कहने हमसे क्यों बदले-बदले रहते हो
हाँ जबसे देखा तुमको, थोडा-थोडा बदला हूँ मैं ।

एक 'सलिल' बेरंग हुआ पर कर डाले रंगीन कई
काली-काली सूरत में बस थोडा सा उजला हूँ मैं ।

Tuesday, 19 March 2013

अब यहाँ आराम ही आराम है !!!

जगमगाते शह्र की इक शाम है
जिन्दगी फिरसे तुम्हारे नाम है ।

मेरे हाथों में है गुल की पंखुड़ी
और दिल में इश्क का पैगाम है ।

है नशा कुछ और ही इस याद में
ये भजन, गीता, जुबाँ पर राम है ।

गेसुओं की छांह में आकर लगा
अब यहाँ आराम ही आराम है ।

तुम न आये, मैं रहा चौराह पर
इश्क का कैसा हुआ अंजाम है ।

अब न दो तालीम इज्जत की 'सलिल'

यूँ भी तुमपर प्रीत का इल्जाम है ।