तिश्नगी

तिश्नगी प्रीत है, रीत है, गीत है
तिश्नगी प्यास है, हार है, जीत है

Friday, 3 January 2014

शेष !!!

नदियों में जल नहीं बचा
दरख्तों पर नहीं बचे फल-फूल
फलों में स्वाद,
फूलों में महक नहीं बची
धरा पर नहीं बचा धैर्य |

नहीं बची फुदकती गौरैया
जुगनू, तितलियाँ
पहाड़ों पर हिमनद
सुदूर बुग्यालों में नहीं बचे ब्रह्म-कमल |

न बचने की कगार पर है -
खेती योग्य जमीन
मृदा का उपजाऊपन
स्वच्छ हवा-जल
और जीवन |

अब ऐसे में
जब प्रकृति स्वयं अप्राकृतिक हो जाय
मानव हो जाय मशीन
ख़त्म हो जाएँ भावनाएँ इन्सानियत और भाईचारे की,
आदमी के भीतर आदमी और
हिंदुस्तान के भीतर हिंदुस्तान बचे रहने की कल्पना
बेमानी नहीं तो और क्या है |

                    आशीष नैथानी ‘सलिल’

Saturday, 14 December 2013

निवेश

 मैं निवेश कर रहा हूँ अपनी नींदें
तुम्हारे प्यार में,
नफा-नुकसान सोचे बगैर
यूँ भी मुहब्बत कोई सौदा तो नहीं |

मैं जानता हूँ कि वहाँ
तुमने भी जुगनुओं से कर ली होगी दोस्ती,
तारों से जान-पहचान हो चुकी होगी अब तक
और चाँद खिड़की पे बैठ मुस्कुराता रहता होगा |

सूरज की किरणें अखरोट के पेड़ पर चढ़कर
झाँकती होंगी तुम्हारे कमरे में,
और गौरैयों के गाने तुम्हारी नींद में दखल देते होंगे |

अब तो डाकिया भी चिठ्ठियाँ बाँटने में लापरवाही करता होगा,
फ़ोन रखने की सलाह देता होगा,
मगर तुम्हारी उस आदत का क्या
जो यादों को संजोये रखना चाहती है,
ख़त, पैगाम, चिट्ठियों के मार्फ़त |

विश्वास करो,
यहाँ मैं भी कमोबेश उसी हालत में हूँ
शहर की भीड़ में अकेला सा,
जैसे कई कागजों के बीच रह जाता है एक कागज़
दबा हुआ सा,
मुड़ा हुआ सा,
कागजों की तह बिगाड़ता हुआ |

तुम्हारे गाँव और मेरे शहर में
हम दोनों की हालत एक सी है,
एक टूटे हुए पत्ते की माफिक
जिसे इधर की हवा उधर और
उधर की हवा इधर उड़ाने का प्रयास करती है |

खैर...

सुनो ! पिछले हफ्ते भेजा है एक और ख़त मैंने
पढ़ना, सँभालकर रखना या फाड़ देना,
क्या पता किस काम आ जाये ये निरीह ख़त
हँसने-मुस्कुराने के,
अलाव तापने के या फिर
तुम्हारी आँखों की नमी हटाने के |

-- आशीष नैथानी 'सलिल'


Monday, 25 November 2013

कागज !


कागज पर लिखा होता है 'अ'
और लिखा होता है - १ भी,
बच्चों द्वारा खिंची होती हैं छोटी-बड़ी रेखाएँ
बेमतलब मगर महत्वपूर्ण |

कागज पर अक्षर, शब्द, वाक्य लिखे होते हैं
लिखे होते हैं सुख-दुःख के अनुच्छेद,
तमाम अनुभूतियों की कथाएं
विरह का दर्द और
मिलन सा सुकून लिखा होता है |

कागज पर छपी होती है जन्मपत्री
छपा होता है समाचार
और छपा होता है पंचांग भी | 

कागज -
जिस पर टिका रहता है सरकारी तंत्र
जो दस्तावेजों की शक्ल में रहता है,
जिसमें दायर की जाती है अर्जी
जिसमें चलते हैं मुक़दमे और
जिसमें लिखकर सुनाई जाती है सजा भी |

कागज, जिससे बच्चे बना लेते हैं कश्ती,
पतंग या गुड़िया
और फिर जो कूड़े में शामिल हो जाता है |
वही कागज जिस पर छपते हैं चुनावी पोस्टर,
गुमशुदा रपट,
भण्डारे की सूचना और
आतंकियों का चेहरा भी |
हाँ, वही कागज जो लिफाफे के रूप में घर पहुँचता है |

कागज जिसका अर्थ होता है
जिससे अर्थ होता है,
जिसे चाव से खा जाती है गौ |

कागज जिस पर लिखा जाता है पहला प्रेमपत्र,
जिसमें छपती हैं पुस्तकें,
जिसमें अक्षरज्ञान होता है |

क्रमशः...

Tuesday, 19 November 2013

यही वो कह रही है !!!

नहीं उतरी धरा पर, फिर भी क्या-क्या सह रही है |
मुझे हो जाने दो पैदा यही वो कह रही है ||

मैं माँ तेरा, खिलौना हूँ, मुझे बाँहों में रखना
मैं बाबूजी, हूँ खुशबू सी, मुझे साँसों में रखना,
मैं बनकर तितलियों सी, घर में उड़ना चाहती हूँ
अपने भाईयों से जी भरके लड़ना चाहती हूँ ।

टूटकर बेटी कैसे कतरा-कतरा बह रही है ।
मुझे हो जाने दो पैदा यही वो कह रही है ||

मैं जुगनू बन उडूँगी लेके अपने हौंसले को
प्यार से सजा लूँगी माँ, अपने घर के घौंसले को
मैं तुम्हारी गोद में, बर्फ सी मिलना चाहती हूँ
पुरानी शाख पर नये पुष्पों सी खिलना चाहती हूँ  ।

बाढ़ सी बेटी किनारे तोड़ आगे बह रही है ।
मुझे हो जाने दो पैदा यही वो कह रही है ||

पहाड़ों पर सुबह जैसी, मुझे घर में आने दो माँ
नदियों के हरे जल सी, आँखों में समाने दो माँ,
मुझे भी सुननी है दादी-औ-नानी से कहानियाँ
मुझे रोने दो जी भरकर, जी भरकर रुलाने दो माँ ।

अजन्मी कली, बसन्त में बरसात सी बह रही है  ।
मुझे हो जाने दो पैदा यही वो कह रही है |
मुझे हो जाने दो पैदा यही वो कह रही है ||