तिश्नगी

तिश्नगी प्रीत है, रीत है, गीत है
तिश्नगी प्यास है, हार है, जीत है

Sunday, 1 April 2012

"गजल"

पलकों से गिरता हर आँसू मुडकर ये कहता है,
कोई मेरा अपना भी "जन्नत" में रहता है |

यादें तेरी पास मेरे और जिस्म पराया सा,
फिर भी दिल तन्हा-तन्हा, तन्हाई सहता है |

सीखी जिससे रिश्तेदारी, रश्मों की बुनियादें,
वो खुद ही रिश्तों से अब मुँह फेरे रहता है |

सोच रहा था, इस बार करूंगा राज की बातें,
क्या मालूम कि राज हमेशा राज ही रहता है |

मुझको जिस पर एतबार कुछ खुद से ज्यादा "भाई",
होकर रुखसत राख-राख गंगा में बहता है |
कोई मेरा अपना भी "जन्नत" में रहता है ||

--------------------- "आशीष नैथानी/ हैदराबाद" ----------------------

मेरा नन्हा देश


हाथों में लिये छेनी और छोटी सी हथौड़ी,

या उठाने की कोशिश किसी बड़े पत्थर को |

बस आठ-दस बरस में मिट्टी में घुलता संसार,

यही मेरा नन्हा सा देश, यही मेरा नन्हा सा प्यार ||  


कोई कूड़े के ढेर से बीनता खाली बोतलें,

तो कोई मूंगफली की ठेली पर तपता दिनभर,

कोई जूठे बर्तन मलकर भी खाता दुत्कार,

यही मेरा नन्हा सा देश, यही मेरा नन्हा सा प्यार ||  


कहीं हाथों में कटोरा लिये दर-दर भटकता बचपन,

कोई कंक्रीट के ढेर पर लिये माटी से चुम्बन |

कही कारखाने में जिंदगी को करता आर-पार,

यही मेरा नन्हा सा देश, यही मेरा नन्हा सा प्यार ||  


कहीं खुद नादाँ किसी नादाँ की हिफाजत करता,

कहीं तुलसी की माला बेच खुदा की जियारत करता |

जिंदगी खींचने को भूला खुद को, घर परिवार,

यही मेरा नन्हा सा देश, यही मेरा नन्हा सा प्यार ||  


छोटी सी आँखे मैली, मैला-मैला सा जामा,

छोटे से तन्हा दिल में बड़े खाबों का हंगामा |

कोई नहीं है ऐसा जो दे इन सपनों को भी आकार,

यही मेरा नन्हा सा देश, यही मेरा नन्हा सा प्यार |

यही मेरा नन्हा सा देश, यही मेरा नन्हा सा प्यार ||  

----------------------------"आशीष नैथानी/ हैदराबाद"----------------------------   

मंजिल और मुसाफिर


दो राहें हैं जीवन के हर एक सफ़र में

दिखते हैं संगत हर एक नजर में

एक है ख़ुशी एक में ग़मों का बसेरा

एक में है सवेरा तो एक में अँधेरा

सही रास्ते को तु चुन ऐ मुसाफिर !

लौटना पड़े ना यहाँ से तुझे फिर !!



जाना बहुत दूर तुझको है राही

राहों के कंटक भी देंगे गवाही

शूलों की ना तू परवाह कर अब

यही तो हैं पथ के सच्चे सहारे

इन्ही से सहारा तू ले अब मुसाफिर !

लौटना पड़े ना यहाँ से तुझे फिर !!



जेहन में रख मत फूलों की बातें

मखमली यादें और चांदनी रातें

आगे है मंजिल तेरा निशाना

जहाँ ना लगेगा कोई बेगाना

मंजिल को तू कसकर पकड़ ले मुसाफिर !

लौटना पड़े ना यहाँ से तुझे फिर !!

Saturday, 31 March 2012

तुम्हारी खूबसूरती


तुम्हारी खूबसूरती देखकर तो कभी,
कभी खुदा भी सोचता होगा
कि ऐसी गलती कर गया मैं कैसे ?

ऐसी गलती कर गया मैं कैसे,
एक बनायी धरती मैंने
एक सूर्य,
एक गगन बनाया
पर कब, कहाँ, क्यों और कैसे मैं
इस जमीं पर दो चाँद उतार लाया ||

Sunday, 25 March 2012

चाँद से इजहार


रात पूनम की,
स्वच्छ धवल आकाश
शबनम की बूँद से तारे
मैं खड़ा छत पर
सुनसान, वीरान अँधेरा
सुहाना मौसम
बातों में मशगूल
मैं और मेरी चंदा |

बहुत हँसी हैं वो
आज आँखों में काजल
बालों में गजरा सजा है |

मैंने पूछा, कैसी हो ?
ठीक हूँ, वो मुस्कुरायी |

तुम बड़ी खूब लगती हो
चन्दा हूँ, बादल नहीं
गर्व से भरा उत्तर मिला |

फिर मैं साहस जुटाकर बोला
मेरा कद कितना है ?
आकाश से कम |

मैं कितना सफ़र तय करूँगा ?
हवा से कम, पानी से कम |

मेरे दिल की सीमा ?
धरती से छोटी है, बहुत छोटी है |

मेरे दिल के शब्द फूट गये,
मुझे तुम्हारे साथ सफ़र तय करना है |
मुझे नभ से धरा का दर्शन करना है |
मुझे तुम्हारे संग जीना है, संग मरना है |
मेरा इज़हार पूरा हुआ ||

कोमल लबों से गर्जना हुयी
चन्दा को पाना खेल नहीं है
बादल होती तो टूटकर बरस जाती
धुप होती तो खिलकर चमक जाती
"मैं राजकन्या हूँ नभ की"
तुम्हारा हक़ सिर्फ दीदार करना है
हमें पाने की मुराद रखने वाले
अपने वजूद को जरा देख ले ||

मैंने अपना सर झुकाया
निराश को कमरे में लौट आया
या खुदा तुने भी क्या खेल खिलाया,
सच्चे आशिक के दिल को हरजाई से मिलाया ||