तिश्नगी

तिश्नगी प्रीत है, रीत है, गीत है
तिश्नगी प्यास है, हार है, जीत है

Saturday, 17 January 2015

सरहद के आर-पार !!

बनाने वाले ने पहाड़ों से सरहदें बनाई
नदियों से खींची थी लकीरें
मगर आदमी-आदमी के मध्य सरहद आदमी ने रची

रंग की सरहद
भाषा की सरहद
सियासी लिप्साओं की सरहद

सरहदें कितनी भी खौफनाक क्यों न हों
धरती दोनों तरफ एक सी है
एक ही किस्म की मिट्टी
एक ही रंग के पहाड़
एक से जंगल
और एक से इंसान

एक से बच्चे
कमोबेश एक से सपने
बुजुर्गों की एक सी प्रतीक्षारत आँखें
दोनों ओर बन्दूकें लिए एक से सैनिक

उजाले में सरहदें बेहद डरावनी लगती हैं
और रात के समय दिखाई नहीं देती |

Tuesday, 6 January 2015

दिनभर का खबरनामा

एक जवान फिर शहीद हो गया
पिता ने कहा कि नाज है बेटे पर,
साइना नेहवाल ने लड़-झगड़कर पद्म पुरूस्कार हासिल कर लिया |

जारी...

Thursday, 18 December 2014

क्या हुआ कोशिश अगर ज़ाया गई

क्या हुआ कोशिश अगर ज़ाया गई
दोस्ती हमको निभानी आ गई |

बाँधकर रखता भला कैसे उसे
आज पिंजर तोड़कर चिड़िया गई |

चूड़ियों की खनखनाहट थी सुबह
शाम को लौटी तो घर तन्हा गई |

लहलहाते खेत थे कल तक यहाँ
आज माटी गाँव की पथरा गई |

कैस तुमको फ़ख्र हो माशूक पर
पत्थरों के बीच फिर लैला गई |

आज फिर आँखों में सूखा है 'सलिल'
ज़िन्दगी फिर से तुम्हें झुठला गई |

Tuesday, 4 November 2014

लौटना, न लौटना !!

घनी आबादी में रहना समाज में रहना तो नहीं
तकनीकों के मध्य रहना तकनीकी होना भी नही
और अकेला रहना असामाजिक होना तो बिलकुल नहीं

उस काल में पैदा होना
जब कि मिट्टी का रंग आँखें न पहचानती हों
न मालूम हो पकते धान की खुशबू
और हल से हो एक स्थाई अजनबीपन,
रोजी की खोज में शहर आना बाध्यता होती है

मगर यहाँ आना कभी पूरा आना नहीं होता  
न यहाँ से लौटना ही हो पाता है कभी पूरा

व्यस्त घड़ियों में सोमवार की पिछली शाम
शहर में खुश रहने की दलीलें तब साबित होती हैं झूठी
जब एक दोस्त बातों ही बातों में कह उठता है
अपने दिल की बात
कि ‘मैं पहाड़ लौटना चाहता हूँ |’

                          - आशीष नैथानी !!

Friday, 17 October 2014

October ki Ghazal

दरिया को राह देके समन्दर बनाइये
पत्थर उठाइये, किसी का घर बनाइये |

बर्बाद यूँ न कीजिए अश्कों की दौलतें
जज्बों को रोककर कोई लश्कर बनाइये |