तिश्नगी

तिश्नगी प्रीत है, रीत है, गीत है
तिश्नगी प्यास है, हार है, जीत है

Monday, 1 September 2014

अगस्त महीने की ग़ज़ल !

डायरी पर लफ्ज़ उतरे तेरे घर जाने के बाद
और भी वीरानियाँ हैं दिल के वीराने के बाद |

ऐसे सच को सच की नजरों से भला देखेगा कौन 
सामने जो आएगा अखबार छप जाने के बाद |

जिद कहें बच्चों की या फिर कह लें हम मासूमियत
खेल खेलेंगे उसी मिट्टी में समझाने के बाद |

ज़िन्दगी बस दो सिरों के बीच फँसकर रह गयी 
तीसरी भी हो जगह घर और मैखाने के बाद |

छोड़ दें ढीला न यूँ रिश्तों को अब उलझाएँ हम 
रस्सियाँ सुलझी नहीं टूटी हैं उलझाने के बाद |

आपके इस शहर में हासिल हुआ ये तज्रिबा 
रास्तों पर बुत मिले हर ओर बुतखाने के बाद |

सुब्ह भी होती रही औ' दर्द भी जाता रहा 
'शम्अ भी जलती रही परवाना जल जाने के बाद |'

जाइये उजड़े घरों में फिर से गेरू पोतिये
लौटकर है फायदा क्या उम्र ढह जाने के बाद |

                          आशीष नैथानी 'सलिल'
                       अगस्त,३०/२०१४ (हैदराबाद)


Saturday, 9 August 2014

ग़ज़ल !!

जाने कब कोई अपना हो जाता है
इक चेहरा दिल का टुकड़ा हो जाता है |

कभी-कभी घर में ऐसा हो जाता है
सबका एक अलग कमरा हो जाता है |

जज्बों की बाढ़ आती है पलभर और फिर
‘धीरे-धीरे सब सहरा हो जाता है |’

हँसी-ख़ुशी सब कुछ रहती है सपनों में
सुब्ह उठूँ तो सब कूड़ा हो जाता है |

बेटा जब रिश्तों की कद्र नहीं करता
सच तब कड़वे से कड़वा हो जाता है |

सहर नहीं होती तन्हाई की शब की
कभी-कभी मौसम को क्या हो जाता है |

याद कभी तो हाल समझ मेरे दिल का
यादों से इन्सां बूढ़ा हो जाता है |

                    आशीष नैथानी 'सलिल'
                    'लफ्ज़' तरही १३ से

एक ग़ज़ल !!

शहर भर का दर्द पीना चाहता हैं
शख़्स कैसा है ये जीना चाहता है |

इत्र से मजदूर का रिश्ता भी कैसा
जो महज बहता पसीना चाहता है |

तीरगी के इस समन्दर में मुसाफ़िर
रौशनी का इक सफ़ीना चाहता है |

इस सियासत में बहुत पत्थर भरे हैं
मुल्क अब कोई नगीना चाहता है |

- आशीष नैथानी सलिल
पुष्पक - अंक २४ (हैदराबाद) से २०१३ में प्रकाशित 

Sunday, 27 July 2014

माँ और पहाड़ !!

सीढ़ियों पर चढ़ता हूँ
तो सोचता हूँ माँ के बारे
कैसे चढ़ती रही होगी पहाड़ |

जेठ के उन तपते घामों में
जब मैं या दीदी या फिर छोटू बीमार पड़े होंगे
तो कैसे हमें उठाकर लाती रही होगी
हमारा लाश सा बेसुध तन
डॉक्टर के पास |

घास और लकड़ी के बड़े-बड़े गठ्ठर
चप्पल जितनी चौड़ी पगडंडियों पर लाना
कोई लतीफ़ा तो न रहा होगा
वो भी तब जब कोई ऊँचाई से खौफ़ खाता हो |

जंगलों की लाल तपती धूप
नई और कमजोर माँ पर रहम भी न करती रही होगी
माँ के साँवलेपन में ईष्टदेव सूरज
करीने से काजल मढ़ते होंगे
और माँ उन्हें सुबह-सुबह ठंडा जल पिलाती होगी | 

पूर्णिमा पर चाँद की पूजा करने वाली
अँधेरे में डरते-डरते छत पर जाती होगी
और भागती होगी पूजा जल्दी से निपटाकर
डर से - जैसे सन्नाटा पीछा कर रहा हो,
खुद को सँभालती हुई तंग छज्जे पर |

हममें से कोई रो पड़ता
और उसकी नींद स्वाह हो जाती |

हमें सुलाने के लिए कभी-कभी
रेडियो चलाती
धीमी आवाज में गढ़वाली गीत सुनती,
गुनगुनाती भी |

उन पहाड़ों की परतों के पार
शायद ही दुवाएँ, प्रार्थनाएँ जाती रही होंगी
जाती थी सिर्फ एक रोड़वेज़ की बस
सुबह-सुबह
जो कभी अपनों को लेकर नहीं लौटती थी |

पिताजी एक गरीब मुलाजिम रहे,
आप शायद दोनों का अर्थ बखूबी जानते होंगे
गरीब का भी और मुलाजिम का भी |

छब्बीस की उम्र में
चार कदम चलकर थकने लगता हूँ मैं
साँस किसी बच्चे की तरह
फेफड़ों में धमाचौकड़ी करने लगती है,
बात-बात पर मैं अक्सर बिखर सा जाता हूँ |

क्या इसी उम्र में माँ भी कभी निराश हुई होगी
अपने तीन दुधमुँहे बच्चों से,
पति का पत्र न मिलने की चिन्ता भी बराबर रही होगी  |

थकता, टूटता हूँ तो करता हूँ माँ से बातें
(फोन पर ही सही)
निराशा धूप निकलते ही
कपड़ों के गीलेपन के जैसे गायब हो जाती है, 
सोचता हूँ
वो किससे बातें किया करती होगी तब
दुःख दर्द में
अवसाद की घड़ियों में,
ससुराल की तकलीफ़ किसे कहती होगी
वो जिसकी माँ उसे ५ साल में ही छोड़कर चल बसी थी |

आशीष नैथानी  
मार्च/२३/२०१४
हैदराबाद !!

ग़ज़ल !!

मुंसिफ़ों ने नहीं पूछी मेरी इच्छा मुझसे
जाने किस बात से नाराज़ है दुनिया मुझसे |

नौकरी छूटी तो फिर देर से घर आने लगा
डर था माँगे न खिलौना मेरा बच्चा मुझसे |

रंग गिरना है हवेली का भी अबके सावन
गुफ़्तगू में कहे आषाढ़ महीना मुझसे |

हिज़्र की रात मेरे साथ ग़ज़ब और हुआ
रौशनी माँग रहा था जो अँधेरा मुझसे |

खर्च कर दे मुझे तू अपने लिए चैन कमा
कह गया जेब का वो आख़िरी सिक्का मुझसे |

मेरे होंटों को मिला लफ्ज़ न उस वक़्त कोई
मेरे दुश्मन ने मेरा हाल जो पूछा मुझसे |

ज़िन्दगी तेरे सिवा किससे तआरुफ़ मेरा
और तू ही कहे तू कौन है मेरा, मुझसे |

इतने दुख इतने मसाइल हैं निजी जीवन में
किसको फ़ुर्सत है करे मुल्क का चर्चा मुझसे |