तिश्नगी

तिश्नगी प्रीत है, रीत है, गीत है
तिश्नगी प्यास है, हार है, जीत है

Saturday, 24 March 2012

Major Gn (Rtd.) B. C. Khanduri... A Skilled Administrator...


ऐसा शायद ही राजनीतिक इतिहास में पहले कभी हुआ हो कि चुनाव हार जाने के बाद किसी राजनेता का कद पहले से भी बड़ा हो जाय | किन्तु मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) भुवन चन्द्र खंडूरी एक ऐसे नेता हैं जिनका अपना प्रसंशक तबका है | यह कुछ ऐसा ही है जैसे कि भारतीय क्रिकेट टीम के हार जाने के बावजूद सचिन के प्रसंशक उनपर अपना भरोसा कायम रखते हैं | मुझे उत्तराखंड की राजनीति कुछ डोलती सी नजर आ रही है | संभवतः मुख्यमंत्री का फैसला कल युवराज की माताजी दस जनपथ में कर देंगी और जहाँ तक मुझे लगता है, प्रोफेसर रावत बाजी मार लेंगे | कांग्रेस ने बिना किसी की अगुवाई में चुनाव लड़ा और अब विचार हो रहा है मुख्यमंत्री पर लेकिंग भाजपा ने १ नाम के नीचे चुनाव लड़ा और कमोबेश सफलता भी मिली | खंडूरी जी के हार जाने से ये कहना की ३१ सीटें उनकी बदौलत नहीं मिली, नाइंसाफी होगा |


फेसबुक पर लगावत कई प्रकार के पोस्ट देखकर यह लेख लिखने की इच्छा हुई | यह किसी पार्टी विशेष से प्रेरित होकर नहीं लिखा गया है किन्तु १ सच्चे और ईमानदार राजनेता के लिए लिखा गया है | और जो भी इसका विरोध करना चाहें, सादर आमंत्रित हैं | मैं कांग्रेस पार्टी से सिर्फ यही चाहता हूँ कि लोकपाल कानून को भंग ना करे |मुझे हरीश रावत जी के मुख्यमंत्री बनने पर प्रसन्नता होती मगर राज्यसुख की लिप्सा सब कुछ बर्बाद कर देती है | खैर... 


मुझे आज भी याद है ४ साल पहले राजेंद्र सिंह भंडारी (पूर्व युवा एवं खेल मंत्री-उत्तराखंड) का दिया गया वो भाषण जिसमे उन्होंने श्री खंडूरी कि सराहना करते हुए कहा था कि मैं कभी उनका साथ नही छोड़उगा | जहाँ खंडूरी जी जायेंगे मैं वहीँ जाऊंगा | यह राजनीति है, सब चलता है भैया | अपने अपने नहीं रहते तो परायों से कैसा शिकवा....


यह तो सभी जानते हैं कि कौन कितना मैला है | यही कारण है कि खंडूरी जी कि लोकप्रियता बढ़ रही है और निशंक साहब को हर कोई जीतने के बावजूद खरी-खोटी सुना रहा है| जहाँ तक मुझे नजर आ रहा है, खंडूरी केंद्र कि राजनीति में वापस जा सकते हैं, जिसके २ कारण हैं :१) २०१४ में भाजपा हर लोकसभा सीट को गंभीरता से लेगी और वैसे भी इस सीट पर भाजपा के प्रत्याशी श्री टी. पी. एस. रावत साहब बगावत कर चुके हैं और यह सीट श्री महाराज जी के पास है |२) राज्य में श्री खंडूरी के पास कोई जिम्मेदारी नहीं है, और एक सफल प्रशाषक की हैसियत से उन्हें जल्द ही मजबूत स्थिति दी जानी चाहिए |


खैर मैं किसी पार्टी विशेष कि तरफदारी नहीं करता, मैं व्यक्ति-विशेष पर भरोषा करता हूँ|  उत्तर प्रदेश में जीजा जी मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, जीजा जी इसलिए क्योंकि अखिलेश जी कि धर्मंपत्नी श्रीमती डिम्पल रावत यादव जी उत्तराखंड से ही ताल्लुकात रखती हैं | शुभ कामनाये |


इसी उम्मीद के साथ कि प्रचंड सूरज खंडूरी कभी अस्त नहीं होगा :


आशीष नैथानी/हैदराबाद...... 

Saturday, 7 January 2012

बात हिन्दोस्तान की

जब फ़साना हो विजय का, बात हो सम्मान की,
जब तरानों में जिकर हो शहीदों के जान की |
जब हवा खुशबू समेटे हिमालय से चल पड़े,
बस समझ लो हो रही है बात हिन्दोस्तान की ||

जब कटारें हाथ में ले चल पड़े सैनिक जहाँ,
और माटी के तिलक ने कर दिये बच्चे जवाँ |
जब सपूतों ने नहीं की कभी परवाह प्रान की,
बस समझ लो हो रही है बात हिन्दोस्तान की ||


कारगिल से बज उठी धुन राष्ट्र के गुणगान की,
चूडियाँ दुल्हन की टूटी नये नौजवान की |
और जब वीरों ने जीती जंग स्वाभिमान की,
बस समझ लो हो रही है बात हिन्दोस्तान की ||


जहाँ हिन्दू - मुस्लिमों ने ईद और होली मनायी,
जहाँ ग्वाले श्याम ने थी रास लीलायें रचायी |
जो जमीं खुद दे गवाही शून्य के उत्थान की,
बस समझ लो हो रही है बात हिन्दोस्तान की ||

जहाँ कुछ पगडंडियाँ हों, फसल हो धन-धान की,
जहाँ बच्चे जानते हों बड़ों के सम्मान की |
और जब 'लता जी' गा उठी कुछ पंक्ति 'राष्ट्रगान' की,
बस समझ लो हो रही है बात हिन्दोस्तान की || 

एक है छत वो तिरंगा और एक अपनी धरा,
रख झुकाकर अपनी नजरें ऐ जहाँ तू सुन जरा |
चीरकर टुकड़े तेरे कर सकती है तलवार म्यान की,
बस समझ लो हो रही है बात हिन्दोस्तान की ||
बस समझ लो हो रही है बात हिन्दोस्तान की ||



Friday, 9 December 2011

बेचैन दिल को फकत करार चाहिए !!!

इब्तिला हों  गयी बहुत अब जरा प्यार चाहिए ,

या खुदा बेचैन दिल को फकत करार चाहिए |

 

ये आँखे जगी हैं सारी उम्र उनके तस्सवुर में,

जो जग जाय खातिर मेरी, ऐसी अब्सार चाहिए |


सब हैं बेअसर से, ये सूरत, ये सीरत, ये समझ भी, 

जो जीत ले दिल उनका एक ऐसा हथियार चाहिये |


मिलती है गवाही तुफाँ की जमीदोज दरख्तों से,

फिर जीने का है अरमाँ महज नौबहार चाहिए |

या खुदा बेचैन दिल को फकत करार चाहिए ||



 
शब्दार्थ 
इब्तिला = दर्द, कष्ट
फकत = थोडा सा, मामुली
तसव्वुर= कल्पना, दिवास्वप्न
अब्सार = आँखें
सीरत = आदत, आंतरिक सौंदर्य
दरख़्त = पेड, वृक्ष
नौबहार = बसंत

-------------------------"आशीष नैथानी/ हैदराबाद"-----------------------------


 

Sunday, 6 November 2011

तुम और मैं !!!

तुम हो चन्दा, मैं गगन हूँ,
तुम हो पानी, मैं पवन हूँ ।
तुम धरा हो, मैं वतन हूँ,
तुम मुहब्बत, मैं अमन हूँ ॥

तुम पलक हो, मैं नयन हूँ,
तुम हो सपना, मैं शयन हूँ ।
तुम हो पावक, मैं तपन हूँ,
तुम शरारा, मैं अगन हूँ ॥

तुम हो पीड़ा, मैं चुभन हूँ,
तुम अमानत, मैं अमन हूँ ।
तुम हो खुश तो मैं मगन हूँ,
बिन तुम्हारे मैं कफ़न हूँ ॥

[ काव्य-संग्रह "तिश्नगी" से ]


Friday, 1 July 2011

भाई


पलकों से गिरता हर आँसू,
मुड़कर ये कहता है ।
कोई मेरा अपना भी,
ज़न्नत में रहता है ।।

यादें जिसकी पास मेरे और 
जिस्म पराया सा ।
फिर भी दिल तन्हा-तन्हा,
तन्हाई सहता है ।।

सीखी जिससे रिश्तेदारी,
रस्मों की बुनियादें ।
वो खुद ही रिश्तों से अब,
मुँह फेरे रहता है ।।

सोच रहा था इस बार करूँगा,
गहरे राज की बातें । 
क्या मालूम कि राज हमेशा,
राज ही रहता है ।।

मुझको जिस पर ऐतबार कुछ,
खुद से ज्यादा 'भाई' ।
होकर रुखसत राख - राख,
गंगा में बहता है ।
कोई मेरा अपना भी,
ज़न्नत में रहता है ।।